Sunday, December 10, 2017

कोई तो होगा.......


कोई तो होगा मुझ-सा,
बिल्कुल मेरे जैसा,
मेरे स्वतंत्र खयालों सा,
मन के तम में
उजियालों सा!

समझ सकेगा मेरी
अनकही बातों को,
रोक सकेगा अनचाहे
लुढ़कते आंसुओं को,
उसका तासीर
मेरे जीने के अनुकूल होगा,
उसका खयाल मात्र ही
मेरा सुकून होगा,
कोई तो ऐसा होगा!

अपनी सारी दुविधा आज
कचरे के डब्बे में फेंक आऊंगी,
अपनी मायूसी को भी
जलते चुलहे में झोंक आऊंगी,
बाग से सारी खुशबू
खुद में बटोर लाऊंगी,
कोई जो तितली मिली, उसकी अठखेलियां भी समेट लाऊंगी .....

पंछियों से थोड़ी
चहचहाहट उधार ले लूंगी,
मन मलीन हो गया है,
सूरज की किरणों से
स्नान कर आऊंगी,
चांद को अपने बालों में खोंसकर
चांदनी का लहंगा पहनुंगी,
आईने से गुफ्तगू कर
खुद को खूब संवारूंगी,
हर वो यत्न, जो मुझे उसके
करीब लाये, करूँगी,
उससे मिलवाने की अपील
सारी कायनात से करूँगी...
बहुत हो गया, यूँ
हाथ पे हाथ धरे बैठे रहना,
अपने मीत की तलाश
अब मैं खुद करूँगी ।

(Painting from Google)

चूक गए तुम!


हे शाक्य!
पूरी दुनिया पूजती है तुम्हें, 
तुम्हारे घर छोड़ने पे
सराहती है तुम्हें, 
तुम भिक्षुक बने,
ज्ञानी बने, 
अपने सिद्धांतों पे चले,
पर ना तुमने पीछे मुड़कर देखा,
ना ही जग ने मेरी सुध ली।
मैं अभागिन!
किसी ने ना सोचा, 
कैसे जियूंगी मैं? 
क्या जबाब दूंगी 
इस समाज को,
हमारे अबोध शिशु को?
कैसे उसकी जिज्ञासा पर
अंकुश लगाऊंगी मैं? 
और फिर मेरा क्या? 
मेरे स्त्रीत्व का क्या? 
नितांत अकेली,
यायावर -सी
कहाँ - कहाँ भटकूंगी मैं? 
हे शाक्य!
तुमने सत्य की खोज तो की,
पर चूक गए तुम 
पुरुष धर्म से,
समझ ना सके
स्त्री की अंतर्वेदना को!
कम से कम बताकर जाते,
देखते 
मेरी शक्ति को,
परखते 
तुम्हारी राह में बाधा बनती हूँ 
या अंजूरी भरकर 
तुम्हें द्वार तक
स्वयं ही विदाई देती हूँ? 
पर जग की तरह ही
तुमने भी मुझे अशक्त समझा, 
मेरी कोमल भावनाओं को 
निर्बलता से आंका! 
चूक गए तुम
नारी -शक्ति को परखने में,
हां शाक्य!
चूक गए तुम!

कोई तो होगा....... कोई तो होगा मुझ-सा, बिल्कुल मेरे जैसा, मेरे स्वतंत्र खयालों सा, मन के तम में उजियालों सा! समझ सकेगा मेरी अनकही...