Saturday, December 9, 2017

जिंदगी की दास्ताँ

                                     
हम रोज सुनते हैं 
एक दूसरे की,
कुछ तुम बताते हो
कुछ मैं सुनाती हूँ 
पर हमारे बेजान भाव सबकुछ कह देते हैं 
शब्दों से पहले।
तुम्हें पता है
और मुझे भी पता है
कि बस औपचारिकता रह गई है
इन सुनने और सुनाने में,
बस ये एक नाकाम कोशिश है
हमारे रिश्ते में पड़ी दरार को
भरने की,
हमें पता है,
कुछ नहीं बनने बिगड़ने वाला,
ग्रहों को अपने रिश्ते के पक्ष में करने को
ज्योतिष से पूछा उपाय भी
बेअसर होने वाला,
जो बेरूखी आई है
हमारे अहसासों में,
शायद ताउम्र अपना
वर्चस्व स्थापित कर ले,
और हमें दोराहे पे खड़ा कर
सदा के लिए हमें मौन कर दे।
पर फिर भी कहीं
एक आस दिखती है
जैसे कड़क धूप के बाद
संध्या की शीतलता का आना,
अविरल अश्रु बहने के बाद
मन का हल्का होना,
शायद एकदिन
तुम भी मुझे समझ सको
और हम मिलकर
इस गांठ को खोल दें।

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